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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 30: श्रीराम के व्यङ्ग करने पर खर का उनके ऊपर साल वृक्ष का प्रहार करना, श्रीराम का तेजस्वी बाण से खर को मार गिराना  »  श्लोक 36-37h
 
 
श्लोक  3.30.36-37h 
एषां वधार्थं शत्रूणां रक्षसां पापकर्मणाम्।
तदिदं न: कृतं कार्यं त्वया दशरथात्मज॥ ३६॥
स्वधर्मं प्रचरिष्यन्ति दण्डकेषु महर्षय:।
 
 
अनुवाद
'ऋषियों के शत्रु इन पापी राक्षसों के वध के लिए आपका यहाँ आगमन आवश्यक समझा गया था। हे दशरथपुत्र! आपने हमारे लिए यह महान कार्य संपन्न किया है। अब महान ऋषिगण दण्डकारण्य के विभिन्न क्षेत्रों में निर्भय होकर अपने धार्मिक अनुष्ठान करेंगे।'॥36 1/2॥
 
‘Your arrival here was considered necessary for the killing of these sinful demons who were the enemies of the sages. O son of Dasharathan! You have accomplished this great task for us. Now the great sages and rishis will fearlessly perform their religious rituals in the various regions of Dandakaranya.'॥ 36 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)