श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 27: त्रिशिरा का वध  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.27.4 
अहं वास्य रणे मृत्युरेष वा समरे मम।
विनिवर्त्य रणोत्साहं मुहूर्तं प्राश्निको भव॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'या तो मैं इस युद्ध में उनका काल बनूँगा, या वे समरांगण में मेरी मृत्यु का कारण बनेंगे। इस समय तुम अपना युद्ध-संबंधी उत्साह रोक दो और क्षण भर के लिए जय-पराजय का निर्णय करने वाले साक्षी बन जाओ। 4॥
 
'Either I will become their death in this war, or they will be the cause of my death in Samrangana. At this time, stop your war-related enthusiasm and for a moment become the witness who decides victory and defeat. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)