श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 25: राक्षसों का श्रीराम पर आक्रमण और श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा राक्षसों का संहार  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  3.25.16-17 
ततो रामस्तु संक्रुद्धो मण्डलीकृतकार्मुक:॥ १६॥
ससर्ज निशितान् बाणान् शतशोऽथ सहस्रश:।
दुरावारान् दुर्विषहान् कालपाशोपमान् रणे॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर श्री रामचन्द्रजी ने अत्यन्त क्रोधित होकर अपने धनुष को इतना खींचा कि वह गोल दिखाई देने लगा। फिर उन्होंने युद्धभूमि में उस धनुष से सैकड़ों, हजारों ऐसे तीखे बाण छोड़ने आरम्भ किए, जिन्हें रोकना अत्यन्त कठिन था, जो न केवल असह्य थे, अपितु मृत्यु के पाश के समान भयंकर भी थे॥16-17॥
 
Thereafter, Shri Ramchandraji became very angry and pulled his bow so much that it started appearing round. Then he started shooting hundreds, thousands of such sharp arrows from that bow on the battlefield, which were very difficult to stop, which were not only unbearable but also as dreadful as the noose of death.॥16-17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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