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ramayan 3.2.12-13h: 'मैं विराध नामक राक्षस हूँ और प्रतिदिन ऋषियों का मांस खाता और हाथों में शस्त्र धारण करता हुआ इस दुर्गम वन में विचरण करता हूँ।॥12 1/2॥   |   ramayan सर्ग 3.2: वन के भीतर श्रीराम, लक्ष्मण और सीता पर विराध का आक्रमण   ।   ramayan काण्ड 3: अरण्य काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 2: वन के भीतर श्रीराम, लक्ष्मण और सीता पर विराध का आक्रमण  »  श्लोक 12-13h
 
 
श्लोक  3.2.12-13h 
अहं वनमिदं दुर्गं विराधो नाम राक्षस:॥ १२॥
चरामि सायुधो नित्यमृषिमांसानि भक्षयन्।
 
 
अनुवाद
'मैं विराध नामक राक्षस हूँ और प्रतिदिन ऋषियों का मांस खाता और हाथों में शस्त्र धारण करता हुआ इस दुर्गम वन में विचरण करता हूँ।॥12 1/2॥
 
'I am a demon named Virādha and I roam this inaccessible forest every day, eating the flesh of sages and carrying weapons in my hands.॥ 12 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)