|
| |
| |
श्लोक 3.17.18-19h  |
त्वां तु वेदितुमिच्छामि कस्य त्वं कासि कस्य वा।
त्वं हि तावन्मनोज्ञाङ्गी राक्षसी प्रतिभासि मे॥ १८॥
इह वा किंनिमित्तं त्वमागता ब्रूहि तत्त्वत:। |
| |
| |
| अनुवाद |
| अब मैं तुम्हारा परिचय जानना चाहता हूँ। तुम किसकी पुत्री हो? तुम्हारा नाम क्या है? और तुम किसकी पत्नी हो? तुम्हारे अंग इतने सुन्दर हैं कि तुम मुझे एक राक्षसी प्रतीत होती हो जो इच्छानुसार कोई भी रूप धारण कर सकती हो। तुम यहाँ क्यों आई हो? मुझे ठीक-ठीक बताओ।॥18॥ |
| |
| ‘Now I want to know your identity. Whose daughter are you? What is your name? And whose wife are you? Your body parts are so beautiful that you appear to me as a demoness who can take any form at will. Why have you come here? Tell me this precisely.’॥18॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|