श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 17: श्रीराम के आश्रम में शूर्पणखा का आना, उनका परिचय जानना और अपना परिचय देकर उनसे अपने को भार्या के रूप में ग्रहण करने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  3.17.12-13 
शरीरजसमाविष्टा राक्षसी राममब्रवीत्।
जटी तापसवेषेण सभार्य: शरचापधृक्॥ १२॥
आगतस्त्वमिमं देशं कथं राक्षससेवितम्।
किमागमनकृत्यं ते तत्त्वमाख्यातुमर्हसि॥ १३॥
 
 
अनुवाद
तब वह राक्षसी काम से विह्वल होकर (मनोरम रूप धारण करके) श्री रामजी के पास आई और बोली - 'तपस्वी वेश धारण किए, सिर पर जटाएँ, स्त्री को साथ लिए, हाथ में धनुष-बाण लिए आप इस राक्षसलोक में कैसे आए? यहाँ आने का क्या प्रयोजन है? यह सब ठीक-ठीक मुझसे कहिए।'॥12-13॥
 
Then that demoness, overcome with lust, came to Shri Ram (assuming a charming appearance) and said, 'Disguised as an ascetic, with matted hair on his head, with a woman with him and a bow and arrow in his hands, how did you come to this land of demons? What is the purpose of your coming here? Tell me all this precisely.'॥ 12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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