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श्लोक 3.16.39  |
संस्मराम्यस्य वाक्यानि प्रियाणि मधुराणि च।
हृद्यान्यमृतकल्पानि मन:प्रह्लादनानि च॥ ३९॥ |
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| अनुवाद |
| मुझे भरतजी के अत्यन्त प्रिय, मधुर, मन को प्रसन्न करने वाले और अमृत के समान हृदय को प्रसन्न करने वाले वचन स्मरण हो रहे हैं॥ 39॥ |
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| 'I am reminded of Bharat's most dear, sweet, pleasing to the mind and heart-warming words like nectar.॥ 39॥ |
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