श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 16: लक्ष्मण के द्वारा हेमन्त ऋतु का वर्णन और भरत की प्रशंसा तथा श्रीराम का उन दोनों के साथ गोदावरी नदी में स्नान  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.16.33 
जित: स्वर्गस्तव भ्रात्रा भरतेन महात्मना।
वनस्थमपि तापस्ये यस्त्वामनुविधीयते॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
'आपके भाई महात्मा भरत ने निश्चय ही स्वर्गलोक को जीत लिया है, क्योंकि वे भी तपस्या में लीन हैं और आपके बताए हुए वन में रहने के मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं॥ 33॥
 
'Your brother, the great soul Bharata, has certainly conquered the heavenly planets, since he too is immersed in austerity and is following your path of living in the forest.॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)