श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 16: लक्ष्मण के द्वारा हेमन्त ऋतु का वर्णन और भरत की प्रशंसा तथा श्रीराम का उन दोनों के साथ गोदावरी नदी में स्नान  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.16.28 
त्यक्त्वा राज्यं च मानं च भोगांश्च विविधान् बहून्।
तपस्वी नियताहार: शेते शीते महीतले॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वह राज्य, मान और अनेक सुखों का त्याग करके तपस्या में लगा रहता है और नियमित भोजन करता हुआ इस शीतल पृथ्वी पर बिना शय्या के सोता है॥ 28॥
 
'Having given up kingdom, honour and numerous pleasures, he is engaged in austerities and taking regular meals, he sleeps on this cool earth without a bed.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)