श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 11: पञ्चाप्सर तीर्थ एवं माण्डकर्णि मुनि की कथा, विभिन्न आश्रमों में घूमकर श्रीराम आदि का सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना तथा अगस्त्य के प्रभाव का वर्णन  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  3.11.77 
ततोऽब्रवीत् समीपस्थं रामो राजीवलोचन:।
पृष्ठतोऽनुगतं वीरं लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम्॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
उस समय कमलनेत्र श्री रामजी अपने पीछे-पीछे आनेवाले और निकट खड़े हुए वीर एवं मनोहर लक्ष्मण से बोले -॥77॥
 
At that time, the lotus-eyed Sri Rama spoke to the brave and graceful Lakshmana who was following him and was standing close by -॥ 77॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)