श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 11: पञ्चाप्सर तीर्थ एवं माण्डकर्णि मुनि की कथा, विभिन्न आश्रमों में घूमकर श्रीराम आदि का सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना तथा अगस्त्य के प्रभाव का वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.11.5 
ते गत्वा दूरमध्वानं लम्बमाने दिवाकरे।
ददृशु: सहिता रम्यं तटाकं योजनायुतम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
बहुत दूर तक यात्रा करने के बाद जब सूर्य अस्त होने को हुआ, तब उन तीनों ने एक साथ देखा - सामने एक अत्यंत सुंदर तालाब था, जिसकी लंबाई-चौड़ाई एक-एक योजन की प्रतीत होती थी ॥5॥
 
After travelling a long distance, when the sun was about to set, all three of them saw together - there was a very beautiful pond in front of them, whose length and breadth seemed to be one yojana each. ॥5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)