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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 3: अरण्य काण्ड
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सर्ग 11: पञ्चाप्सर तीर्थ एवं माण्डकर्णि मुनि की कथा, विभिन्न आश्रमों में घूमकर श्रीराम आदि का सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना तथा अगस्त्य के प्रभाव का वर्णन
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श्लोक 46
श्लोक
3.11.46
सुतीक्ष्णेनोपदिष्टेन गत्वा तेन पथा सुखम्।
इदं परमसंहृष्टो वाक्यं लक्ष्मणमब्रवीत्॥ ४६॥
अनुवाद
इस प्रकार सुतीक्ष्ण के बताए हुए मार्ग पर सुखपूर्वक चलते हुए श्री रामचंद्रजी ने महान आनंद में भरे हुए लक्ष्मण से यह कहा-॥46॥
Thus, while walking happily on the path shown by Sutikshna, Shri Ramchandraji, filled with great joy, said this to Lakshmana -॥ 46॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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