श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 3: अरण्य काण्ड  »  सर्ग 11: पञ्चाप्सर तीर्थ एवं माण्डकर्णि मुनि की कथा, विभिन्न आश्रमों में घूमकर श्रीराम आदि का सुतीक्ष्ण के आश्रम में आना तथा अगस्त्य के प्रभाव का वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.11.45 
पश्यन् वनानि चित्राणि पर्वतांश्चाभ्रसंनिभान्।
सरांसि सरितश्चैव पथि मार्गवशानुगान्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
रास्ते में पड़ने वाले विचित्र जंगलों, बादलों जैसी पर्वत श्रृंखलाओं, झीलों और नदियों को देखते हुए वे अपने रास्ते पर आगे बढ़ते रहे।
 
Looking at the strange forests, mountain ranges like clouds, lakes and rivers that they encountered on the way, they continued on their way.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)