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ramayan 2.99.18: इस प्रकार विलाप करते हुए दशरथपुत्र भरत ने वन में एक बड़ी कुटिया देखी जो अत्यंत पवित्र और सुन्दर थी॥18॥   |   ramayan सर्ग 2.99: भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला देख रोते-रोते चरणों में गिरना, श्रीराम का उन सबको हृदय से लगाना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 99: भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला देख रोते-रोते चरणों में गिरना, श्रीराम का उन सबको हृदय से लगाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.99.18 
एवं स विलपंस्तस्मिन् वने दशरथात्मज:।
ददर्श महतीं पुण्यां पर्णशालां मनोरमाम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार विलाप करते हुए दशरथपुत्र भरत ने वन में एक बड़ी कुटिया देखी जो अत्यंत पवित्र और सुन्दर थी॥18॥
 
While lamenting in this manner, Bharata, the son of Dasaratha, saw a large hut in the forest that was extremely sacred and beautiful.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)