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ramayan 2.99.15: हे! मेरे ही कारण सिंहरूपी पुरुष श्री रामचन्द्र इस निर्जन वन में आकर वीरासन में पृथ्वी पर विराजमान हैं; इसलिए मेरा जन्म और जीवन धिक्कार है॥15॥   |   ramayan सर्ग 2.99: भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला देख रोते-रोते चरणों में गिरना, श्रीराम का उन सबको हृदय से लगाना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 99: भरत का शत्रुघ्न आदि के साथ श्रीराम के आश्रम पर जाना, उनकी पर्णशाला देख रोते-रोते चरणों में गिरना, श्रीराम का उन सबको हृदय से लगाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.99.15 
जगत्यां पुरुषव्याघ्र आस्ते वीरासने रत:।
जनेन्द्रो निर्जनं प्राप्य धिङ्मे जन्म सजीवितम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे! मेरे ही कारण सिंहरूपी पुरुष श्री रामचन्द्र इस निर्जन वन में आकर वीरासन में पृथ्वी पर विराजमान हैं; इसलिए मेरा जन्म और जीवन धिक्कार है॥15॥
 
'Oh! It is because of me that the lion-like man Shri Ramchandra comes to this lonely forest and sits on the open earth in Veerasan; therefore my birth and life are cursed.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)