श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 98: भरत के द्वारा श्रीराम के आश्रम की खोज का प्रबन्ध तथा उन्हें आश्रम का दर्शन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.98.9 
यावन्न चरणौ भ्रातु: पार्थिवव्यञ्जनान्वितौ।
शिरसा प्रग्रहीष्यामि न मे शान्तिर्भविष्यति॥ ९॥
 
 
अनुवाद
जब तक मैं अपने भाई श्री रामजी के राजसी गुणों वाले चरण अपने सिर पर न रख लूँ, तब तक मुझे शांति नहीं मिलेगी॥ 9॥
 
'Till I place my brother Sri Rama's feet, which are of royal characteristics, on my head, I will not find peace.॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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