श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 98: भरत के द्वारा श्रीराम के आश्रम की खोज का प्रबन्ध तथा उन्हें आश्रम का दर्शन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.98.7 
यावन्न चन्द्रसंकाशं तद् द्रक्ष्यामि शुभाननम्।
भ्रातु: पद्मविशालाक्षं न मे शान्तिर्भविष्यति॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'जब तक मैं कमल के समान विशाल नेत्रों वाले अपने पूज्य भाई श्री रामजी का सुन्दर मुख न देख लूँ, तब तक मेरे मन को शांति नहीं मिलेगी। 7॥
 
'My mind will not find peace until I see the beautiful face of my revered brother Shri Ram with huge eyes like the lotus pond. 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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