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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 97: श्रीराम का लक्ष्मण के रोष को शान्त करके भरत के सद्भाव का वर्णन करना,लक्ष्मण का लज्जित होना और भरत की सेना का पर्वत के नीचे छावनी डालना
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श्लोक 26
श्लोक
2.97.26
न तु पश्यामि तच्छत्रं पाण्डुरं लोकविश्रुतम्।
पितुर्दिव्यं महाभाग संशयो भवतीह मे॥ २६॥
अनुवाद
'महात्मन! परंतु मैं इसके ऊपर पिता जी का विश्वविख्यात दिव्य श्वेत छत्र नहीं देख पाता - इससे मेरे मन में संदेह उत्पन्न होता है॥ 26॥
'Great man! But I cannot see father's world-famous divine white umbrella above it - this creates doubt in my mind.॥ 26॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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