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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 96: लक्ष्मण का शाल-वृक्ष पर चढ़कर भरत की सेना को देखना और उनके प्रति अपना रोषपूर्ण उद्गार प्रकट करना  »  श्लोक 27-28h
 
 
श्लोक  2.96.27-28h 
अद्येमं संयतं क्रोधमसत्कारं च मानद॥ २७॥
मोक्ष्यामि शत्रुसैन्येषु कक्षेष्विव हुताशनम्।
 
 
अनुवाद
'हे माननीय! आज मैं शत्रु सेना पर अपने दबे हुए क्रोध और तिरस्कार को उसी प्रकार प्रकट करूँगा, जैसे सूखी घास के ढेर में आग लगा दी जाती है।॥27 1/2॥
 
'Honorable! Today I will unleash my suppressed anger and contempt on the enemy forces in the same manner as a heap of dry grass is set on fire.॥ 27 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)