श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 95: श्रीराम का सीता के प्रति मन्दाकिनी नदी की शोभा का वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.95.7 
आदित्यमुपतिष्ठन्ते नियमादूर्ध्वबाहव:।
एते परे विशालाक्षि मुनय: संशितव्रता:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'विशालोचने! ये अन्य ऋषिगण कठोर व्रत का पालन करते हुए नित्यकर्म के अनुसार दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सूर्यदेव की पूजा कर रहे हैं।
 
'Vishallochane! These other sages, who are observing strict fasts, are worshipping the Sun God with both their arms raised as per the daily routine.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)