श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 95: श्रीराम का सीता के प्रति मन्दाकिनी नदी की शोभा का वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  2.95.16 
लक्ष्मणश्चैव धर्मात्मा मन्निदेशे व्यवस्थित:।
त्वं चानुकूला वैदेहि प्रीतिं जनयती मम॥ १६॥
 
 
अनुवाद
'विदेहनन्दिनी! धर्मात्मा लक्ष्मण सदैव मेरी आज्ञा में रहते हैं और तुम भी मेरी इच्छानुसार आचरण करो; इससे मुझे बहुत प्रसन्नता होती है॥ 16॥
 
'Videhanandini! The virtuous Lakshmana always remains under my command and you too act according to my wishes; this gives me great pleasure.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)