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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 92: भरत का भरद्वाज मुनि से श्रीराम के आश्रम जाने का मार्ग जानना, वहाँ से चित्रकूट के लिये सेना सहित प्रस्थान करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.92.7 
आमन्त्रयेऽहं भगवन् कामं त्वामृषिसत्तम।
समीपं प्रस्थितं भ्रातुर्मैत्रेणेक्षस्व चक्षुषा॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'प्रभो! महामुनि! अब मैं अपनी इच्छानुसार आपकी अनुमति लेने आया हूँ और अपने भाई के पास जा रहा हूँ; कृपया मुझ पर स्नेह की दृष्टि डालें।
 
'Lord! Great sage! Now I have come to seek your permission as per my wish and I am going to my brother; please look at me with affection.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)