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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 91: भरद्वाज मुनि के द्वारा सेना सहित भरत का दिव्य सत्कार  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.91.7 
राज्ञा हि भगवन् नित्यं राजपुत्रेण वा तथा।
यत्नत: परिहर्तव्या विषयेषु तपस्विन:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'प्रभो! राजा और राजकुमार को प्रत्येक देश में तपस्वियों को सभी से दूर रखने का प्रयत्न करना चाहिए (क्योंकि उनसे उन्हें हानि होने की सम्भावना रहती है)।
 
'Lord! The king and the prince should try to keep the ascetics away from everyone in every country (as there is a possibility of them being harmed by them).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)