श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 90: भरत और भरद्वाज मुनि की भेंट एवं बातचीत तथा मुनि का अपने आश्रम पर ही ठहरने का आदेश देना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.90.4 
वसिष्ठमथ दृष्ट्वैव भरद्वाजो महातपा:।
संचचालासनात् तूर्णं शिष्यानर्घ्यमिति ब्रुवन्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
महर्षि वशिष्ठ को देखकर महातपस्वी भारद्वाज अपने आसन से उठ खड़े हुए और अपने शिष्यों से शीघ्रता से अर्घ्य लाने को कहा।
 
On seeing Maharishi Vasishtha, the great ascetic Bharadwaj stood up from his seat and asked his disciples to quickly bring him arghya.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)