श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 90: भरत और भरद्वाज मुनि की भेंट एवं बातचीत तथा मुनि का अपने आश्रम पर ही ठहरने का आदेश देना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.90.21 
जाने चैतन्मन:स्थं ते दृढीकरणमस्त्विति।
अपृच्छं त्वां तवात्यर्थं कीर्तिं समभिवर्धयन्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'मैं तुम्हारे मन की बात जानता हूँ; तथापि मैंने यह इसलिए पूछा है कि तुम्हारी यह भावना और अधिक दृढ़ हो जाए और तुम्हारा यश अधिकाधिक फैल जाए॥ 21॥
 
'I know what is in your mind; however, I have asked this so that this feeling of yours may become stronger and your fame may spread more and more.॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)