श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 9: कुब्जा के कुचक्र से कैकेयी का कोप भवन में प्रवेश  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  2.9.57 
तदा हेमोपमा तत्र कुब्जावाक्यवशंगता।
संविश्य भूमौ कैकेयी मन्थरामिदमब्रवीत्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
सुवर्ण के समान सुन्दर कान्ति वाली कैकेयी कुब्जा के वचनों से मोहित हो गई, अतः वह भूमि पर लेट गई और मन्थरा से इस प्रकार बोली-॥57॥
 
Kaikeyi, who had a beautiful radiance like gold, was captivated by Kubja's words, so she lay down on the ground and spoke to Manthra thus -॥ 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)