vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
»
काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
»
सर्ग 9: कुब्जा के कुचक्र से कैकेयी का कोप भवन में प्रवेश
»
श्लोक 53
श्लोक
2.9.53
इति प्रशस्यमाना सा कैकेयीमिदमब्रवीत्।
शयानां शयने शुभ्रे वेद्यामग्निशिखामिव॥ ५३॥
अनुवाद
जब कुब्जा की इस प्रकार स्तुति हो गई, तब वह कैकेयी से, जो वेदी पर प्रज्वलित अग्नि की ज्वाला के समान श्वेत शय्या पर लेटी हुई थी, इस प्रकार बोली ॥ 53॥
When Kubja was thus praised, she spoke thus to Kaikeyi, who was reclining on a bed as white as the flame of a fire blazing on the altar:॥ 53॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×