श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 9: कुब्जा के कुचक्र से कैकेयी का कोप भवन में प्रवेश  »  श्लोक 49-50
 
 
श्लोक  2.9.49-50 
मुखे च तिलकं चित्रं जातरूपमयं शुभम्॥ ४९॥
कारयिष्यामि ते कुब्जे शुभान्याभरणानि च।
परिधाय शुभे वस्त्रे देवतेव चरिष्यसि॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
'कुब्जेय! मैं तुम्हारे मुख (माथे) पर एक सुन्दर एवं अद्वितीय स्वर्णमुकुट लगवाऊँगा तथा तुम अनेक सुन्दर आभूषण तथा दो उत्तम वस्त्र (लहंगा और दुपट्टा) धारण करके स्वर्ग की अप्सराओं के समान विचरण करोगी।'
 
‘Kubje! I will get a beautiful and unique gold mark put on your face (forehead) and you will wear many beautiful ornaments and two excellent garments (lehenga and dupatta) and roam around like a celestial nymph. 49-50.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)