श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 9: कुब्जा के कुचक्र से कैकेयी का कोप भवन में प्रवेश  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  2.9.17-18 
तुष्टेन तेन दत्तौ ते द्वौ वरौ शुभदर्शने।
स त्वयोक्त: पतिर्देवि यदेच्छेयं तदा वरम्॥ १७॥
गृह्णीयां तु तदा भर्तस्तथेत्युक्तं महात्मना।
अनभिज्ञा ह्यहं देवि त्वयैव कथितं पुरा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
'शुभदर्शन! इससे संतुष्ट होकर राजा ने आपसे दो वर माँगे। देवि! उस समय आपने अपने पति से कहा - 'हे प्रियतम! जब मेरी इच्छा होगी, तब मैं ये वर माँगूँगी।' उस समय उस महाबली राजा ने आपकी बात मानकर 'ऐसा ही हो' कहा। देवि! मैं यह कथा नहीं जानता था। पूर्वकाल में आपने स्वयं मुझे यह कथा सुनाई थी। 17-18।
 
'Shubhdarshan! Satisfied with this, the king asked to give you two boons. Devi! At that time you said to your husband - 'My dear one! When I wish, I will ask for these boons.' At that time that great king agreed to your words saying 'So be it'. Devi! I did not know this story. In the past, you yourself had told me this story. 17-18.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)