श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 87: भरत की मूर्छा से गुह, शत्रुघ्न और माताओं का दुःखी होना, भरत का गुह से श्रीराम आदि के भोजन और शयन आदि के विषय में पूछना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.87.9 
पुत्र व्याधिर्न ते कच्चिच्छरीरं प्रति बाधते।
अस्य राजकुलस्याद्य त्वदधीनं हि जीवितम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
'बेटा! क्या तुम्हारे शरीर को कोई रोग सता रहा है? अब इस वंश का जीवन तुम्हारे हाथ में है।॥9॥
 
'Son! Is any disease troubling your body? Now the life of this dynasty is in your hands.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)