श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 86: निषादराज गुह के द्वारा लक्ष्मण के सद्भाव और विलाप का वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.86.17 
अतिक्रान्तमतिक्रान्तमनवाप्य मनोरथम्।
राज्ये राममनिक्षिप्य पिता मे विनशिष्यति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
(राजा भगवान राम को राजा बनाना चाहते थे) अपनी इच्छा पूरी न कर पाने पर मेरे पिता यह कहते हुए प्राण त्याग देंगे कि, 'हाय! मेरा तो सब कुछ नष्ट हो गया! नष्ट हो गया!'॥17॥
 
(The King wanted to anoint Lord Rama as the king) Without being able to fulfil his desire, my father will give up his life saying, 'Alas! Everything of mine is destroyed! It is destroyed!'॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)