श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 86: निषादराज गुह के द्वारा लक्ष्मण के सद्भाव और विलाप का वर्णन  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  2.86.12-13 
महता तपसा लब्धो विविधैश्च परिश्रमै:।
एको दशरथस्यैष पुत्र: सदृशलक्षण:॥ १२॥
अस्मिन् प्रव्राजिते राजा न चिरं वर्तयिष्यति।
विधवा मेदिनी नूनं क्षिप्रमेव भविष्यति॥ १३॥
 
 
अनुवाद
राजा दशरथ, जिन्होंने घोर तप और अनेक प्रकार के कठिन उपायों से अपने ही समान गुणों वाले इस ज्येष्ठ पुत्र को प्राप्त किया है, श्री राम के वन में आने पर अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकेंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि यह पृथ्वी शीघ्र ही विधवा हो जाएगी॥12-13॥
 
‘King Dasharath, who has got this eldest son with the same good qualities as himself, by great penance and various types of painstaking measures, will not be able to live for long if Shri Ram comes to the forest. It seems that this earth will soon become a widow.॥ 12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)