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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 85: गुह और भरत की बातचीत तथा भरत का शोक  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.85.21 
विनि:श्वसन् वै भृशदुर्मनास्तत:
प्रमूढसंज्ञ: परमापदं गत:।
शमं न लेभे हृदयज्वरार्दितो
नरर्षभो यूथहतो यथर्षभ:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
उनका मन बहुत दुःखी था। उन्होंने एक गहरी साँस ली और अचानक अपनी सुध-बुध खोकर बड़े संकट में पड़ गए। मानसिक चिन्ता के कारण, पुरुषोत्तम भरत को शांति नहीं मिल रही थी। उनकी स्थिति अपने झुंड से बिछड़े हुए बैल के समान हो रही थी।
 
His mind was very sad. He took a deep breath and suddenly lost his senses and fell into a great trouble. Due to mental anxiety, Bharata, the best of men, could not find peace. His condition was becoming like that of a bull separated from its herd.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)