श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 84: निषादराज गुह का अपने बन्धुओं भेंट की सामग्री ले भरत के पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.84.7 
तिष्ठन्तु सर्वदाशाश्च गङ्गामन्वाश्रिता नदीम्।
बलयुक्ता नदीरक्षा मांसमूलफलाशना:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
‘सभी नाविक अपनी सेना के साथ गंगा के तट पर नदी की रक्षा के लिए खड़े रहें और नाव पर रखे हुए फल-मूल को ही खाकर रात बिताएँ।॥ 7॥
 
‘All the boatmen should stand with their army on the bank of the Ganga to protect the river and spend the night eating only the fruits and roots kept on the boat.॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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