श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 84: निषादराज गुह का अपने बन्धुओं भेंट की सामग्री ले भरत के पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.84.6 
भर्ता चैव सखा चैव रामो दाशरथिर्मम।
तस्यार्थकामा: संनद्धा गङ्गानूपेऽत्र तिष्ठत॥ ६॥
 
 
अनुवाद
'किन्तु दशरथपुत्र श्री राम मेरे स्वामी और मित्र हैं, अतः उनके कल्याण की कामना से आप सब लोग अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित होकर यहां गंगा के तट पर उपस्थित हों।
 
'But Sri Rama, the son of Dasaratha, is my master and friend, therefore, wishing for his welfare, you all should be present here on the bank of the Ganga, equipped with weapons.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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