श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 84: निषादराज गुह का अपने बन्धुओं भेंट की सामग्री ले भरत के पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.84.5 
सम्पन्नां श्रियमन्विच्छंस्तस्य राज्ञ: सुदुर्लभाम्।
भरत: कैकयीपुत्रो हन्तुं समधिगच्छति॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'राजा कैकेयी का पुत्र भरत दशरथ की धनी एवं दुर्लभ रानी लक्ष्मी को अकेले ही हड़पना चाहता है, इसीलिए वह वन में श्री रामचंद्रजी को मारने जा रहा है॥5॥
 
'King Kaikeyi's son Bharat wants to single-handedly grab Dasharatha's rich and rare queen Lakshmi, that is why he is going to kill Shri Ramchandraji in the forest. 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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