श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 84: निषादराज गुह का अपने बन्धुओं भेंट की सामग्री ले भरत के पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.84.18 
आशंसे स्वाशिता सेना वत्स्यत्येनां विभावरीम्।
अर्चितो विविधै: कामै: श्व: ससैन्यो गमिष्यसि॥ १८॥
 
 
अनुवाद
‘हमें आशा है कि यह सेना आज रात यहीं ठहरेगी और हमारा दिया हुआ भोजन ग्रहण करेगी। आज हम सेना सहित तुम्हारा नाना प्रकार की इच्छित वस्तुओं से स्वागत करेंगे, फिर कल प्रातःकाल तुम अपने सैनिकों के साथ यहाँ से अन्यत्र चले जाओगे।’॥18॥
 
‘We hope that this army will stay here tonight and accept the food offered by us. Today we will welcome you along with the army with various kinds of desirable things, then tomorrow morning you will go somewhere else from here with your soldiers.'॥ 18॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुरशीतितम: सर्ग:॥ ८४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८४॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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