श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 84: निषादराज गुह का अपने बन्धुओं भेंट की सामग्री ले भरत के पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.84.17 
अस्ति मूलफलं चैतन्निषादै: स्वयमर्जितम्।
आर्द्रं शुष्कं तथा मांसं वन्यं चोच्चावचं तथा ॥ १ ७॥
 
 
अनुवाद
ये फल और मूल आपको अर्पित हैं। निषाद लोग स्वयं इन्हें तोड़कर लाए हैं। इनमें से कुछ फल अभी भी ताजे हैं और कुछ सूख गए हैं। इनके साथ ही फलों का गूदा भी है जो तैयार किया गया है। इनके अतिरिक्त अन्य अनेक प्रकार की वन्य वस्तुएँ भी हैं। कृपया इन्हें स्वीकार करें॥ 17॥
 
‘These fruits and roots are presented to you. The Nishad people themselves have plucked them and brought them. Some of these fruits are still fresh and some have dried up. Along with them is the pulp of the fruit which has been prepared. Apart from all these, there are various other types of wild products as well. Please accept them all.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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