श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 84: निषादराज गुह का अपने बन्धुओं भेंट की सामग्री ले भरत के पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.84.15 
लब्ध्वानुज्ञां सम्प्रहृष्टो ज्ञातिभि: परिवारित:।
आगम्य भरतं प्रह्वो गुहो वचनमब्रवीत्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उनसे मिलने की अनुमति पाकर गुह अपने भाइयों और बन्धुओं के साथ प्रसन्नतापूर्वक वहाँ आये और भरत से मिलकर बड़ी विनम्रता से बोले-॥15॥
 
Having obtained permission to meet him, Guha along with his brothers and relatives came there happily and on meeting Bharata he spoke with great humility -॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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