श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 84: निषादराज गुह का अपने बन्धुओं भेंट की सामग्री ले भरत के पास जाना और उनसे आतिथ्य स्वीकार करने के लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  2.84.11 
तमायान्तं तु सम्प्रेक्ष्य सूतपुत्र: प्रतापवान्।
भरतायाचचक्षेऽथ समयज्ञो विनीतवत्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
उसे आते देख, समयानुकूल कर्तव्य को समझने वाले महारथी सुमन्तराम ने भरत से विनीत भाव से कहा-॥11॥
 
Seeing him coming, the valiant son of a charioteer, Sumantram, who understood the timely duty, said to Bharata in a humble manner -॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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