श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 83: भरत की वनयात्रा और शृङ्गवेरपुर में रात्रिवास  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.83.24 
दातुं च तावदिच्छामि स्वर्गतस्य महीपते:।
और्ध्वदेहनिमित्तार्थमवतीर्योदकं नदीम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
'मेरे यहाँ रहने का एक और उद्देश्य है - मैं गंगा में डुबकी लगाना चाहता हूँ और स्वर्गीय महाराज को उनके आध्यात्मिक कल्याण के लिए जल अर्पित करना चाहता हूँ।'॥24॥
 
'There is another purpose of my staying here - I want to take a dip in the Ganga and offer water to the late Maharaj for his spiritual welfare.'॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)