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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 82: वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना
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श्लोक 9
श्लोक
2.82.9
तच्छ्रुत्वा भरतो वाक्यं शोकेनाभिपरिप्लुत:।
जगाम मनसा रामं धर्मज्ञो धर्मकांक्षया॥ ९॥
अनुवाद
यह सुनकर धर्म को जानने वाले भरत शोक में डूब गए और धर्म का पालन करने की इच्छा से उन्होंने मन ही मन श्री राम की शरण ली॥9॥
On hearing this, Bharata, who knew Dharma, was drowned in grief and with the desire to follow Dharma, he mentally took refuge in Shri Ram.॥ 9॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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