श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 82: वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.82.5 
तात राजा दशरथ: स्वर्गतो धर्ममाचरन्।
धनधान्यवतीं स्फीतां प्रदाय पृथिवीं तव॥ ५॥
 
 
अनुवाद
तात! राजा दशरथ तुम्हें यह धन-धान्य से परिपूर्ण पृथ्वी देकर अपने धर्म का पालन करते हुए स्वर्गवासी हो गए हैं॥5॥
 
‘Tat! King Dasharatha, after giving you this prosperous earth full of wealth and grains, has passed away after practicing his own dharma. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)