श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 82: वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.82.14 
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यं कुर्यां पापमहं यदि।
इक्ष्वाकूणामहं लोके भवेयं कुलपांसन:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
'पापपूर्ण आचरण नीच लोगों द्वारा किया जाता है। वह निश्चय ही मनुष्य को नरक में डालने वाला है। यदि मैं भी श्री रामचंद्रजी का राज्य लेकर पाप कर्म करूँ, तो संसार में इक्ष्वाकुकुल का कलंक माना जाऊँगा। 14॥
 
'Sinful behavior is done by mean people. He is definitely going to put man in hell. If I too commit sinful acts by taking the kingdom of Shri Ramchandraji, then I will be considered as the stigma of Ikshvakukul in the world. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)