श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 82: वसिष्ठजी का भरत को राज्य पर अभिषिक्त होने के लिये आदेश देना,भरत का उसे अनुचित बताकर श्रीराम को लाने के लिये वन में चलने की तैयारी का आदेश देना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  2.82.10 
सबाष्पकलया वाचा कलहंसस्वरो युवा।
विललाप सभामध्ये जगर्हे च पुरोहितम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
उस सभा में बालक भरत हंस के समान मधुर स्वर में रोने लगे और आंसू बहाते हुए पुरोहित को डांटने लगे।
 
In that gathering the young Bharata began to cry in a voice as sweet as that of a swan and to rebuke the priest, shedding tears.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)