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ramayan 2.81.7: 'यहाँ तक कि श्री रघुनाथजी को भी, जो हमारे सबसे बड़े स्वामी और रक्षक हैं, मेरी माता ने स्वयं धर्म का परित्याग करके वन में भेज दिया।' ॥7॥   |   ramayan सर्ग 2.81: प्रातःकाल के मङ्गलवाद्य-घोष को सुनकर भरत का दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजी का सभा में आकर मन्त्री आदि को बुलाने के लिये दूत भेजना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 81: प्रातःकाल के मङ्गलवाद्य-घोष को सुनकर भरत का दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजी का सभा में आकर मन्त्री आदि को बुलाने के लिये दूत भेजना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  2.81.7 
यो हि न: सुमहान् नाथ: सोऽपि प्रव्राजितो वने।
अनया धर्ममुत्सृज्य मात्रा मे राघव: स्वयम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
'यहाँ तक कि श्री रघुनाथजी को भी, जो हमारे सबसे बड़े स्वामी और रक्षक हैं, मेरी माता ने स्वयं धर्म का परित्याग करके वन में भेज दिया।' ॥7॥
 
'Even Shri Raghunathji, who is our greatest master and protector, was sent to the forest by my mother herself, abandoning religion.' ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)