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ramayan 2.81.6: ‘आज उन महान राजा धर्मराज की यह धर्म-मूल राज लक्ष्मी जल में पड़ी हुई नाविक रहित नाव के समान इधर-उधर तैर रही है।॥6॥   |   ramayan सर्ग 2.81: प्रातःकाल के मङ्गलवाद्य-घोष को सुनकर भरत का दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजी का सभा में आकर मन्त्री आदि को बुलाने के लिये दूत भेजना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 81: प्रातःकाल के मङ्गलवाद्य-घोष को सुनकर भरत का दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजी का सभा में आकर मन्त्री आदि को बुलाने के लिये दूत भेजना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.81.6 
तस्यैषा धर्मराजस्य धर्ममूला महात्मन:।
परिभ्रमति राजश्रीर्नौरिवाकर्णिका जले॥ ६॥
 
 
अनुवाद
‘आज उन महान राजा धर्मराज की यह धर्म-मूल राज लक्ष्मी जल में पड़ी हुई नाविक रहित नाव के समान इधर-उधर तैर रही है।॥6॥
 
‘Today this Dharma-root Raj Lakshmi of that great King Dharmaraja is floating here and there like a boat without a sailor, lying in the water. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)