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ramayan 2.81.5: 'शत्रुघ्न! देखो तो सही, कैकेयी ने संसार का कितना अहित किया है। राजा दशरथ मुझ पर अनेक दुःख लादकर स्वर्ग सिधार गए हैं।'   |   ramayan सर्ग 2.81: प्रातःकाल के मङ्गलवाद्य-घोष को सुनकर भरत का दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजी का सभा में आकर मन्त्री आदि को बुलाने के लिये दूत भेजना   ।   ramayan काण्ड 2: अयोध्या काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 2: अयोध्या काण्ड  »  सर्ग 81: प्रातःकाल के मङ्गलवाद्य-घोष को सुनकर भरत का दुःखी होना और उसे बंद कराकर विलाप करना, वसिष्ठजी का सभा में आकर मन्त्री आदि को बुलाने के लिये दूत भेजना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.81.5 
पश्य शत्रुघ्न कैकेय्या लोकस्यापकृतं महत्।
विसृज्य मयि दु:खानि राजा दशरथो गत:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'शत्रुघ्न! देखो तो सही, कैकेयी ने संसार का कितना अहित किया है। राजा दशरथ मुझ पर अनेक दुःख लादकर स्वर्ग सिधार गए हैं।'
 
'Shatrughna! Just see how much harm Kaikeyi has done to the world. King Dasharath has burdened me with a lot of sorrows and has gone to heaven. 5.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)