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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 80: अयोध्या से गङ्गा तट तक सुरम्य शिविर और कूप आदि से युक्त सुखद राजमार्ग का निर्माण
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श्लोक 5
श्लोक
2.80.5
ते स्ववारं समास्थाय वर्त्मकर्मणि कोविदा:।
करणैर्विविधोपेतै: पुरस्तात् सम्प्रतस्थिरे॥ ५॥
अनुवाद
वे मार्ग-निर्माण में निपुण कारीगर नाना प्रकार के औजारों से युक्त अपने-अपने दल को साथ लेकर आगे बढ़े ॥5॥
Those artisans skilled in road-building proceeded ahead taking with them their respective teams carrying various kinds of tools. ॥ 5॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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