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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 2: अयोध्या काण्ड
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सर्ग 80: अयोध्या से गङ्गा तट तक सुरम्य शिविर और कूप आदि से युक्त सुखद राजमार्ग का निर्माण
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श्लोक 17
श्लोक
2.80.17
नक्षत्रेषु प्रशस्तेषु मुहूर्तेषु च तद्विद:।
निवेशान् स्थापयामासुर्भरतस्य महात्मन:॥ १७॥
अनुवाद
वास्तु-कर्म के विद्वान पंडितों ने उत्तम नक्षत्रों और शुभ मुहूर्तों में महात्मा भरत के रहने के लिए बनाए गए स्थानों को पवित्र करवाया ॥17॥
The learned scholars of Vastu-karma got the places made for Mahatma Bharat's stay in the best constellations and auspicious times, consecrated. 17॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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